माँ जब अपने छोटे बेटे कृष्णा को हमेशा नाचते गाते देखती तो सोचती कि, यह क्यों नहीं समझता। मैं कितनी मुश्किलों से इन दोनों को पढ़ा रही हूँ? पर वहीं जब वह अपने बड़े बेटे को सदैव किताबों में लगे देखती तो उसे थोड़ी तो खुशी मिलती। धीरे-धीरे दोनों पढ़ते गए और बड़ा बेटा स्कूल व्याख्याता बन गया और छोटा कृष्णा अभी भी नाचता ही दिखाई देता। कभी रासलीला में, तो कभी किसी शादी-ब्याह में। माँ ने बड़े बेटे का विवाह कर दिया ताकि घर में काम करने का सहारा हो जाए। शादी में कृष्णा ने खूब दौड़ भाग कर काम किया। खूब नाच-गान किया। अपने मन की सारी कसर भाई की बारात में नाच-नाच कर निकाली, सब बहुत खुश थे। भाभी भी आ गई।
भाभी के आते ही घर का वातावरण बदल गया जहाँ सदैव शांति बनी रहती थी। अब आए दिन कृष्णा को लेकर झगड़े शुरू हो गए। भाभी बोली, 'या तो यह कमाकर लाये या अलग हो जाए।' माँ बड़े संकट में आ गई। अभी तो उसकी शादी भी नहीं हुई। अलग कैसे रहेगा? ना ही कोई रोजगार है। माँ ने बहू से कहा, 'देखो, बहू अभी कृष्णा की कोई नौकरी नहीं है, ना ही शादी हुई है। पहले शादी हो जाने दो। फिर अलग हो जाना।' बहू ने कहा, 'ठीक है तो पहले इसकी शादी ही कर लीजिए।' कृष्णा अभी शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। उसके सपने बड़े थी। वह बड़ा कलाकार बनना चाहता था। लेकिन भाई- भाभी ने जबरदस्ती उसकी शादी करवा दी। अब क्या करें? क्या खिलाएगा वह पत्नी को? ऐसा सोचते-सोचते शादी की रात उसने बाहर बरामदे में बैठे-बैठे ही निकाल दी। सुबह होते ही कोई कठोर निर्णय उसने ले लिया था, जो अपनी पत्नी को भी नहीं बताया और पत्नी को मायके मिलवाने के बहाने छोड़ कर आ गया। अब घर में अलगोजे की बात चल रही थी। घर वाले उसे अलग करें इससे पहले वह गाँव छोड़कर शहर चला गया। यहाँ अपने किसी रिश्तेदार के पास कुछ दिन रहा। पर रिश्तेदार भी महंगाई के जमाने में मुफ्त की रोटी नहीं खिला सकते, ऐसा सोचकर कोई काम तलाशने लगा। फिर उसे सुबह अखबार बेचने का काम मिल गया। जिससे उसके खाने और रहने का बंदोबस्त हो गया। अखबार का काम सुबह 2 घंटे में पूरा हो जाता और पूरे दिन वह नाच गाने की धुन में लगा रहता। रिश्तेदार भाई को यह बात खलती क्योंकि किराए के मकान में संगीत की आवाजें लोगों को परेशान करती हैं। ये सोच उन्होंने एक दिन कृष्णा को संगीत संस्थान के बारे में बताया। अब तो कृष्णा ने जैसे तैसे करके वहाँ दाखिला पा लिया। कुछ उधार लेकर पैसों का इंतजाम कर फीस भर दी और मेहनत करने लगा।
धीरे-धीरे संगीत संस्थान में गुरु जी को कृष्णा से विशेष लगाव हो गया क्योंकि कृष्णा बहुत जल्दी अथक मेहनत और पूरी लगन से संगीत कक्षा में श्रेष्ठ परिणाम लाया। धीरे-धीरे गुरुजी उसे रंगमंच पर काम दिलवाने लगे। वह घोर परिश्रम से कथक नृत्य में पारंगत हो गया। फिर अब अपना अलग कमरा किराए पर लेकर छोटे बच्चों को संगीत सिखाने लगा, जिससे जो थोड़ी आमदनी उसे होती, उसे वह अपने संगीत के लिए खर्च करता। उसने तो अपनी माँ, भाई-भाभी, पत्नी सबसे जैसे रिश्ता ही तोड़ लिया था। कभी-कबार जब फोन करता तो भाभी ताने मारती कहती, 'क्यों देवर जी किसी फिल्म में काम मिल गया है? या विदेश में जाने का मौका।' कहकर जोर से हँसने लगती। कृष्णा बेचारा रुँआसा होकर फोन काट देता। माँ भी जब कभी बात करती तो वापस आजा बेटा यही कहती। माँ ने एक दिन समझा-बुझाकर कृष्णा को अपनी पत्नी को लाने के लिए ससुराल भेज दिया। जब कृष्णा ससुराल पहुँचा तो, साली ने मजाक बनाना शुरू कर दिया। बोली, 'क्यों जीजा जी शहर में जाकर कितनी फिल्मों में काम मिल गया है? या अभी ऐसे ही नाचते फिरते हो। और फिर हँसते हुए बाहर निकल गई। आज तो कृष्णा के सब्र का पहाड़ ही टूट गया वह उसी समय बाहर आ गया। इतने में ही ससुर जी आ गए और बोले,'आइए जमाई जी, कहाँ चले? बैठिए, उठ कैसे गये? कहीं कुछ काम वाम मिला या अभी भी न नचईयांए हो? यह सुनते ही कृष्णा के दिल में लगी आग पर जैसे घी पड़ गया हो और वह और आग बबूला होकर बिना किसी से कुछ बोले सीधे वापस अपने मां के पास न जाकर शहर आ गया। और सारा दिन अपने बारे में सोचता रहा। क्या किया जाए? मेरे सपने का क्या होगा? क्या कभी मैं कुछ बन पाऊंगा? सोचते-सोचते शाम हो गई। फिर उसे याद आया। आज तो गुरु जी का जन्मदिन का कार्यक्रम है। मुझे वहाँ भी जाना है और सब भूलकर कृष्णा जल्दी से तैयार हुआ। नियत समय पर कार्यक्रम में पहुँच गया। आयोजन बड़ा ही भव्य था। बड़े-बड़े संगीतकार, कलाकार, देश-विदेश में रहने वाले लोग आए थे। कृष्णा वहाँ अपने आप को मामूली सा इंसान समझ एक तरफ बैठा था। तभी गुरु जी ने कृष्णा को माइक पर बुलाया। कृष्णा थोड़ा सकपका गया सोचने लगा। क्या मुझे ही बुलाया गया है? पर वह चुपचाप बैठा रहा। थोड़ी देर बाद गुरु जी ने किसी सहपाठी को उसे ढूंढ कर लाने के लिए कहा। कृष्णा तो जैसे अपने आप को किसी बिल में छुपा लूं या कहाँ छिपूँ ऐसा सोच ही रहा था कि सहपाठी ने देख लिया और उसे पकड़कर स्टेज पर ले गया। जहाँ गुरु जी ने उसे सबके सामने प्रस्तुति के लिए कहा, कृष्णा थोड़ी आनाकानी करते हुए शुरू हो गया। कृष्णा का तो जैसे संगीत के साथ जन्मों का नाता हो, वह जब कभी संगीत सुन लेता वही उसके पैर थिरकने लगते। प्रस्तुति शुरू की और प्रस्तुति समाप्ति से पूर्व ही जोरदार तालियों से पूरा हॉल गूँज उठा। कृष्णा को सबने सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाइयां दी। वही गुरुजी के एक विदेशी मित्र मैक आए हुए थे। वह कृष्णा से बहुत प्रभावित हुए और बोले, 'कृष्णा तुम्हारे गुरुजी तुम्हारी बहुत तारीफ करते हैं पर तुम तो उससे कहीं ज्यादा के काबिल हो। तुम हमारे साथ डेनमार्क चलो। वहाँ भारतीय नृत्य और कला के चाहने वाले बहुत हैं पर सिखाने वाला कोई नहीं। कृष्णा उनकी बातें सुनकर भावुक हो गया। मैक ने कृष्णा को गले लगाया और कहा कि, 'मैं ज्यादा तो नहीं, पर तुम्हें एक संगीत संस्था में शिक्षक का पद दिलवा सकता हूँ। बाकी तुम्हारी मेहनत से तुम जो चाहो पा सकते हो। कृष्णा अपने भावों को रोक नहीं पा रहा था कि वह क्या कहे? अब तक अखबार बेचकर, बच्चों को थोड़ा कत्थक सिखा कर ही जीविका चला रहा था। जैसे उसे अकल्पनीय कथ्य सुनने को मिले हैं। मैक ने फिर पूछा, 'तो बोलो कृष्णा सोच क्या रहे हो?' कृष्णा तो जैसे कब से सामान बांध में बैठा हो। उसके सपनों को उड़ान मिल गई थी। वह जाने के लिए तैयार हो गया।
कुछ दिन बाद कृष्णा डेनमार्क चला गया। वहाँ उसने संगीत शिक्षक के रूप में काम शुरू किया। खाली समय में रात्रि गायन, नृत्य आयोजनों में भाग लेता रहा कई प्रतियोगिताओं में विजयी हुआ। और धीरे-धीरे एक दिन अंतर्राष्ट्रीय कलाकार के रूप में प्रख्यात हो गया। जब घर वालों ने उसकी खबर अखबार, न्यूज़ चैनल, टीवी पर देखी तो सब हैरान रह गए। जिसे सब नचैया, गवैया, नाकारा कहते थे। अब वे सब दाँतों तले अंगुली दबाने लगे।
कृष्णा पुन: जब अपने देश लौटा तो बहुत से उपहारों के साथ। सब परिवार वाले उसका स्वागत करने एयरपोर्ट पर आए आज कृष्णा अपने परिवार को देखकर अश्रुधारा को रोक नहीं पाया। उसे अपनी मन्जिल मिल चुकी थी। उसके सपने साकार हो गए थे। आज वह अपने देश की जमीन पर गर्व से कदम रख रहा था। जब घर पहुँचा तो जो लोग उसके विरोधी हो गए थे, वे सब आज भाग -भाग कर चाय पानी का इंतजाम करने लगी। भाभी ने देवर के लिए गरमा-गरम हलवा पुरी बनाया जो कभी खाना भी नहीं खिलाती थी। कृष्णा ने सब को विदेश से लाए उपहार दिए और सबसे अपने इस तरह छोड़कर जाने के लिए माफी माँगी। लेकिन सबने उसे कब का माफ कर दिया था। सब बहुत खुश थे। आज तो कृष्णा को सब अपने साथ रखना चाह रहे थे। अब कोई अलगोजा करना नहीं चाहता था।
यह सब सोचते-सोचते कृष्णा ने अपने अतीत से निकलकर अखबार वाले बच्चे को अपने पास बुलाया और अखबार खरीद लिया। सोचा शायद इसकी भी सपनाें में उड़ान बाकी हो।
-डॉ. रेखा सैनी

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