Wednesday, November 11, 2020

हिन्दी साहित्य सभा डॉ.रेखा सैनी द्वारा : 'आत्मसम्मान' मेरी स्वरचित कहानी

हिन्दी साहित्य सभा डॉ.रेखा सैनी द्वारा : 'आत्मसम्मान' मेरी स्वरचित कहानी:   आत्मसम्मान सुधा को राष्ट्रीय मंच पर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया गया। समाज सुधार के प्रयास और समाज की सेवा का जो कार्य उसने ...

'आत्मसम्मान' मेरी स्वरचित कहानी

 


आत्मसम्मान

सुधा को राष्ट्रीय मंच पर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया गया। समाज सुधार के प्रयास और समाज की सेवा का जो कार्य उसने किया उसके लिए नामांकित किया गया था। मंच पर सुधा को शाल व प्रशस्ति पत्र के साथ ट्रॉफी से सम्मानित किया गया। मंच को धन्यवाद देकर जैसे ही सुधा अपने स्थान पर बैठी उसने देखा सभागार में उसकी सीट से 2 सीट छोड़कर बैठा आदमी उसे लगातार देख रहा था। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू भरे थे। वह आदमी कोई और नहीं सुधा का पति था, परंतु सुधा उसे अनदेखा कर मंच पर सामने देखने लगी। धीरे-धीरे सुधा के सामने चलचित्र की भांति एक के बाद एक घटनाएं चलने लगी और सुधा पूर्णतया अतीत में खो गई। 

    कैसी स्याह घनी रात के अंधेरे में महेश शराब पी कर लौटे थे। मैं उनके इंतजार में बिना खाए टेबल पर ही सिर झुकाए बैठी थी। तभी डोरबेल ने मेरी तंद्रा तोड़ी, मैंने देखा, महेश सर्द रात मुँह में शराब की बू लिए तुम? तुमने आज फिर शराब पी है?  नहीं अमृत पीकर आ रहा हूँ। हटो! रास्ता छोड़ो, अंदर आने दो सुधा के लिए यह कोई नई बात नहीं थी परंतु आज तो हमारी शादी की सालगिरह है, सुधा ने कितने मन से महेश का मनपसंद केक खुद घंटे मेहनत कर बनाया था, आज सुधा महेश को खुश खबरी भी सुनाने वाली थी, खैर। सुधा परिस्थिति समझ महेश को संभालने लगी। महेश ने नशे में सुधा को तेज धक्का मारा। सुधा का संतुलन बिगड़ गया। सुधा गर्भवती थी और खुद को संभाल न सकी। सिर के बल जमीन पर गिर गई। महेश बिना उसे उठाए और देखे अपने कमरे में चला गया। सुधा को बेहोशी छाने लगी। घर का दरवाजा खुला रह गया। 

   जब सुधा को होश आया तो उसने स्वयं को अस्पताल के बेड पर पाया। सुबह हो चुकी थी। सुधा ने देखा। उनके पड़ोसी मिस्टर एंड मिसेज शर्मा सामने बैठे थे। सुधा बोली मैं यहाँ और आप लोग कैसे? सुधा को फिर चक्कर आने लगा। मिसेज शर्मा बोली, तुम आराम करो सुधा! कल रात हम पार्टी से लेट आए थे तुम्हारे घर का दरवाजा खुला देखा लाइट जली थी। हमें लगा इतनी रात को लाइट कैसे? फिर हम तुम्हारे घर पर आए। तुम्हें वहाँ फर्श पर पड़े देखा, तुम्हारे सिर पर चोट लगी थी। हमने तुरंत अस्पताल लाना उचित समझा। मिस्टर महेश को हमने फोन किया पर उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। हम लोग क्षमाप्रार्थी हैं, बिना पूछे आपके घर में घुसकर…….। सुधा, अरे! नहीं, नहीं, इसमें माफी की आवश्यकता नहीं है। सुधा की आँखों में आँसू देख मिसेज शर्मा सब समझ गयी। मिसेज शर्मा बोली, हमें माफ कर दीजिएगा, हम आपके बच्चे को……..बचा नहीं सके। सुधा सुनकर सन्न रह गई। उसके पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई हो। आँखों से गंगा- जमुना बह निकली। सुधा को तेज पसीना आ गया और चक्कर आने लगे। डॉक्टर को बुला कर दिखाया गया। डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी और घर जाने को कहा। मिस्टर एंड मिसेज शर्मा सुधा को घर ले आए तो देखा महेश क्रोध में जला भुना बैठा था। उसे कल की बात का कोई मलाल नहीं था। महेश के लिए कोई नई बात नहीं थी। आए दिन सुधा को यूँ ही शराब के नशे में मारा-पीटा करता था। सुधा को जब उसने देखा तो बोला कहाँ गई थी? मिस्टर एंड मिसेज शर्मा तब तक जा चुके थे। दोनों पति-पत्नी के बीच में बोलना नहीं चाहते थे। सुधा बिना कुछ बोले, अपने दर्द को सीने में दबाए कमरे में चली गई। महेश ने बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए, फिर कहा, मेरे लिए रात का खाना मत लगाना। मैं आज नहीं आऊँगा। कहते हुए महेश घर से निकल गया। सुधा महेश का जाना देखते रह गई। हालांकि यह जाना वापस आने के लिए था। पर सुधा ने महेश का जिंदगी से हमेशा के लिए चले जाना स्वीकार लिया था। शादी के 10 साल हो चुके थे। इतने साल बाद गर्भवती होकर भी वह पूर्ण माँ नहीं बन सकी। ना ही अपने पति के लिए पत्नी। पति ने कभी उसे पत्नी रूपी प्रेमिका नहीं माना। हमेशा उसे केवल वासना तृप्ति का साधन मात्र समझा। इतने वर्षों से वह महेश के साथ सिर्फ इसलिए रह रही थी, यह सब कुछ सह रही थी कि शायद बच्चे के जन्म से महेश में परिवर्तन आ जाएगा या मैं उन प्रताड़नाओं को भूलकर वात्सल्य में बह जाऊँगी परंतु गर्भपात ने उसे अंदर से तोड़ दिया था। महेश द्वारा दी गई तन की चोटे तो धीरे-धीरे खत्म हो रही थी, लेकिन मन पर लगे घाव इस घर में रह कर नहीं भर सकते थे। 

      सुधा ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। अपने मन के जख्मों को दुनिया से छुपाए सुधा नौकरी की तलाश में निकल पड़ी। महीने भर की भागदौड़ के बाद उसे एक एनजीओ में नौकरी मिल गई। समाज सेवा, महिला सुरक्षा से जुड़े इस संस्था में सुधा ने काम करना उचित समझा। सुधा महेश को भूलने की नाकाम कोशिश कर रही थी। अपने अतीत को वर्तमान से अलग सोच कर काम में लीन रहने लगे। 

       सुधा बहुत मेहनती, आत्मविश्वास से भरी, सुंदर और सुशील थी। उसे देख कोई भी आकर्षित हो जाए, सिवाय पति के। सहकर्मी सदैव सुधा को मुस्कुराते देख सोचते कि कितनी खुश मिजाज है सुधा। इसे जिंदगी में जैसे कभी कोई गम था ही नहीं। सुधा से जब लोग उसके परिवार के बारे में पूछते तो सिर्फ इतना ही कहती मेरा एक पति था जो अब नहीं है। लोग सोचते शायद सुधा का पति मर चुका है। इसलिए अब बंधन रहित है इसलिए अपनी मर्जी से जिंदगी जी रही है। पर इन बातों से सुधा को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह बिना दूसरों की सुनें अपने कार्य में व्यस्त रहती। एनजीओ में आने वाली हर महिला की सुधा मदद करती। उसकी हर समस्या का निराकरण करने का पूरा प्रयास करती भले ही अपनी जिंदगी में, अपना घर न बचा सकी हो, लेकिन आने वाली हर औरत को उचित सलाह देती। मजबूत होने का विश्वास और मदद का हौसला देती, सुधा सबसे अधिक मेहनती थी और हर केस को पूरे मन से सुनकर हल करती। संस्था में सुधा के आत्मविश्वास और मेहनत से सभी लोग प्रसन्न थे। संस्था के कर्मचारियों में विशेष योग्य व्यक्ति को चुनकर राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु नामांकन भेजा गया। सुधा का नाम विशेष सविका के रूप में चुना गया था। राष्ट्रीय मंच पर उसे पुरस्कार के लिए जाना था। सुधा स्वयं मंच पर जाने से पूर्व अपने आप को इस पुरस्कार के योग्य नहीं समझ रही थी। "मैं समाज में भले सेविका बनी। महिलाओं को प्रताड़ना न सहने का आत्मबल प्रदान किया। उन्हें रोजगार दिलवाए, लेकिन खुद 10 साल तक अपने पति की प्रताड़ना, प्रत्येक यातना को चुपचाप सहती रही थी।" उसने अपने मन में चल रहे द्वन्द को खत्म कर अपनी संस्था प्रधान को अपनी जिंदगी की हकीकत बताई, उसकी इस दर्द भरी आत्मकथा को सुनकर संस्था प्रधान की आँखों से सहानुभूति की धारा प्रवाहित हो गई। वे बोली, सुधा तुम्हारे जैसी मजबूत औरत मैंने अपने जीवन के 30 सालों में संस्था में नहीं देखी, जो इतने दुःख सह कर भी मुस्कुरा सकती है। तुमने कभी अपने चेहरे या व्यवहार से किसी को पता ही नहीं चलने दिया कि तुमने समाज के ऐसे पुरुष के साथ जीवन जिया है जो मानवता के नाम पर कलंक है। जो पाश्विकता की सभी हदें पार कर चुका है। तुम धन्य हो सुधा तुमने अपने वजूद, परिवार को खोकर भी दूसरों को बचाने का परिश्रम किया है। इन तीन सालों में तुमने अपनी मेहनत से समाज में नाम पाया है। तुम्हें यह पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए। अब तो मुझे तुमसे विशेष लगाव होने लगा है। संस्था प्रधान ने सुधा की आँखों से निकल रहे मोतियों को अपने आँचल में समेट लिया और अपनी स्नेहमयी ममता से उसे भिगो दिया। आज पहली बार सुधा जीवन में खुलकर रो सकी थी। अपने दिल के सारे बोझ को खत्म कर चुकी थी। 

   संस्था प्रधान उसके पुरस्कार प्राप्ति को लेकर विशेष उत्साहित हो रही थी। आज जीवन में सच्चे,और सही व्यक्ति को यह पुरस्कार मिल रहा है। उन्होंने सुधा को पुरस्कार प्राप्ति के लिए जाने को कहा। सुधा सभी सहकर्मियों तथा संस्था प्रधान से आज्ञा पाकर राष्ट्रीय मंच पर उपस्थित हुई और पुरस्कार प्राप्त किया।

   आज उसे अपने आप से भी कोई शिकायत नहीं रही थी। मैंने भले घर छोड़ा, पति को छोड़ा, घर परिवार सब छोड़ दिया, लेकिन समाज ने मुझे वह सब दिया जो मैं उस घर में खो चुकी थी। मेरा आत्मसम्मान, मेरा विश्वास और मेरा वजूद। 

      दूसरी सीट पर बैठा पति उसके चेहरे की कांति को देखकर सहम गया। उसके पास सुधा से कहने को कुछ नहीं था। आखिर में हिम्मत जुटाकर वह सुधा के पास आकर बोला, "मुझे माफ कर दो, सुधा!, मैं माफी के काबिल तो नहीं,लेकिन…..। उसकी आँखों के पश्चात को सुधा पढ़ चुकी थी। सुधा ने मौन स्वीकृति दी और सभागार से पुरस्कार लेकर अपने घर चली गई। महेश देखता रह गया। महेश जानता था कि उसका अपराध अक्षम्य है। फिर भी वह सुधा से उम्मीद कर रहा था। सुधा ने जाते हुए महेश की तरफ फिर मुड़कर नहीं देखा। अब वह अपना वजूद और आत्मसम्मान पा चुकी थी।

                              -  डॉ. रेखा सैनी

                  सहायक आचार्य ( हिन्दी विभाग)

विजय सेंट्रल एकेडमी कॉलेज,जयपुर राजस्थान


मेरी स्वरचित कहानी सपनों में उड़ान

    


आज डेनमार्क की धरती पर अपने ख्वाबों को हकीकत में बदलता देख कृष्णा मन ही मन मुस्कुरा रहा था। उसने ट्रेन में बैठे- बैठे एक अखबार बेचने वाले बच्चे को देखा और अपने अतीत में खो गया। जब कृष्णा दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था तो पिता का देहांत हो गया। माँ हमेशा बीमार रहती थी। कृष्णा का एक बड़ा भाई भी था सोहन, जो पढ़ाई में होशियार था और मेहनती भी। कृष्णा मेहनती तो था, पर पढ़ने में उसका मन कम लगता था। उसे गाना- बजाना, नाचना बहुत पसंद था। कभी गाँव में कोई रासलीला होती या भजन कीर्तन तो जरूर भाग लेता। धीरे-धीरे वह गाँव में नचनिया के नाम से चढ़ाया जाने लगा। अभी उसने संगीत पाठशाला में दाखिला लिया ही था, घर आकर  संगीत का अभ्यास करता तो पड़ोसी हँसने लगते, कोई नचईया, तो कोई गवैया कहकर सताते लेकिन कृष्णा पर इसका कोई असर नहीं होता। माँ अपने घर और खेती-बाड़ी दोनों को संभाल रही थी ताकि दोनों बच्चों को पढ़ा सके। घर की देखभाल में शायद उसने अपनी बीमारी को भुला दिया था या बीमारी ही उसे छोड़कर चली गई थी।

       माँ जब अपने छोटे बेटे कृष्णा को हमेशा नाचते गाते देखती तो सोचती कि, यह क्यों नहीं समझता। मैं कितनी मुश्किलों से इन दोनों को पढ़ा रही हूँ? पर वहीं जब वह अपने बड़े बेटे को सदैव किताबों में लगे देखती तो उसे थोड़ी तो खुशी मिलती। धीरे-धीरे दोनों पढ़ते गए और बड़ा बेटा स्कूल व्याख्याता बन गया और छोटा कृष्णा अभी भी नाचता ही दिखाई देता। कभी रासलीला में, तो कभी किसी शादी-ब्याह में। माँ ने बड़े बेटे का विवाह कर दिया ताकि घर में काम करने का सहारा हो जाए। शादी में कृष्णा ने खूब दौड़ भाग कर काम किया। खूब नाच-गान किया। अपने मन की सारी कसर भाई की बारात में नाच-नाच कर निकाली, सब बहुत खुश थे। भाभी भी आ गई। 

      भाभी के आते ही घर का वातावरण बदल गया जहाँ सदैव शांति बनी रहती थी। अब आए दिन कृष्णा को लेकर झगड़े शुरू हो गए। भाभी बोली, 'या तो यह कमाकर लाये या अलग हो जाए।' माँ बड़े संकट में आ गई। अभी तो उसकी शादी भी नहीं हुई। अलग कैसे रहेगा? ना ही कोई रोजगार है। माँ ने बहू से कहा, 'देखो, बहू अभी कृष्णा की कोई नौकरी नहीं है, ना ही शादी हुई है। पहले शादी हो जाने दो। फिर अलग हो जाना।' बहू ने कहा, 'ठीक है तो पहले इसकी शादी ही कर लीजिए।'  कृष्णा अभी शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। उसके सपने बड़े थी। वह बड़ा कलाकार बनना चाहता था। लेकिन भाई- भाभी ने जबरदस्ती उसकी शादी करवा दी। अब क्या करें? क्या खिलाएगा वह पत्नी को? ऐसा सोचते-सोचते शादी की रात उसने बाहर बरामदे में बैठे-बैठे ही निकाल दी। सुबह होते ही कोई कठोर निर्णय उसने ले लिया था, जो अपनी पत्नी को भी नहीं बताया और पत्नी को मायके मिलवाने के बहाने छोड़ कर आ गया। अब घर में अलगोजे की बात चल रही थी। घर वाले उसे अलग करें इससे पहले वह गाँव छोड़कर शहर चला गया। यहाँ अपने किसी रिश्तेदार के पास कुछ दिन रहा। पर रिश्तेदार भी महंगाई के जमाने में मुफ्त की रोटी नहीं खिला सकते, ऐसा सोचकर कोई काम तलाशने लगा। फिर उसे सुबह अखबार बेचने का काम मिल गया। जिससे उसके खाने और रहने का बंदोबस्त हो गया। अखबार का काम सुबह 2 घंटे में पूरा हो जाता और पूरे दिन वह नाच गाने की धुन में लगा रहता। रिश्तेदार भाई को यह बात खलती क्योंकि किराए के मकान में संगीत की आवाजें लोगों को परेशान करती हैं। ये सोच उन्होंने एक दिन कृष्णा को संगीत संस्थान के बारे में बताया। अब तो कृष्णा ने जैसे तैसे करके वहाँ दाखिला पा लिया। कुछ उधार लेकर पैसों का इंतजाम कर फीस भर दी और मेहनत करने लगा। 

    धीरे-धीरे संगीत संस्थान में गुरु जी को कृष्णा से विशेष लगाव हो गया क्योंकि कृष्णा बहुत जल्दी अथक मेहनत और पूरी लगन  से संगीत कक्षा में श्रेष्ठ परिणाम लाया। धीरे-धीरे गुरुजी उसे रंगमंच पर काम दिलवाने लगे। वह घोर परिश्रम से कथक नृत्य में पारंगत हो गया। फिर अब अपना अलग कमरा किराए पर लेकर छोटे बच्चों को संगीत सिखाने लगा, जिससे जो थोड़ी आमदनी उसे होती, उसे वह अपने संगीत के लिए खर्च करता। उसने तो अपनी माँ, भाई-भाभी, पत्नी सबसे जैसे रिश्ता ही तोड़ लिया था। कभी-कबार जब फोन करता तो भाभी ताने मारती कहती, 'क्यों देवर जी किसी फिल्म में काम मिल गया है? या विदेश में जाने का मौका।' कहकर जोर से हँसने लगती। कृष्णा बेचारा रुँआसा होकर फोन काट देता। माँ भी जब कभी बात करती तो वापस आजा बेटा यही कहती। माँ ने एक दिन समझा-बुझाकर कृष्णा को अपनी पत्नी को लाने के लिए ससुराल भेज दिया। जब कृष्णा ससुराल पहुँचा तो, साली ने मजाक बनाना शुरू कर दिया। बोली, 'क्यों जीजा जी शहर में जाकर कितनी फिल्मों में काम मिल गया है? या अभी ऐसे ही नाचते फिरते हो। और फिर हँसते हुए बाहर निकल गई। आज तो कृष्णा के सब्र का पहाड़ ही टूट गया वह उसी समय  बाहर आ गया। इतने में ही ससुर जी आ गए और बोले,'आइए जमाई जी, कहाँ चले? बैठिए, उठ कैसे गये? कहीं कुछ काम वाम मिला या अभी भी न नचईयांए हो? यह सुनते ही कृष्णा के दिल में लगी आग पर जैसे घी पड़ गया हो और वह और आग बबूला होकर बिना किसी से कुछ बोले सीधे वापस अपने मां के पास न जाकर शहर आ गया। और सारा दिन अपने बारे में सोचता रहा। क्या किया जाए? मेरे सपने का क्या होगा? क्या कभी मैं कुछ बन पाऊंगा? सोचते-सोचते शाम हो गई। फिर उसे याद आया। आज तो गुरु जी का जन्मदिन का कार्यक्रम है। मुझे वहाँ भी जाना है और सब भूलकर कृष्णा जल्दी से तैयार हुआ। नियत समय पर कार्यक्रम में पहुँच गया। आयोजन बड़ा ही भव्य था। बड़े-बड़े संगीतकार, कलाकार, देश-विदेश में रहने वाले लोग आए थे। कृष्णा वहाँ अपने आप को मामूली सा इंसान समझ एक तरफ बैठा था। तभी गुरु जी ने कृष्णा को माइक पर बुलाया। कृष्णा थोड़ा सकपका गया सोचने लगा। क्या मुझे ही बुलाया गया है? पर वह चुपचाप बैठा रहा। थोड़ी देर बाद गुरु जी ने किसी सहपाठी को उसे ढूंढ कर लाने के लिए कहा। कृष्णा तो जैसे अपने आप को किसी बिल में छुपा लूं या कहाँ छिपूँ ऐसा सोच ही रहा था कि सहपाठी ने देख लिया और उसे पकड़कर स्टेज पर ले गया। जहाँ गुरु जी ने उसे सबके सामने प्रस्तुति के लिए कहा, कृष्णा थोड़ी आनाकानी करते हुए शुरू हो गया। कृष्णा का तो जैसे संगीत के साथ जन्मों का नाता हो, वह जब कभी संगीत सुन लेता वही उसके पैर थिरकने लगते। प्रस्तुति शुरू की और प्रस्तुति समाप्ति से पूर्व ही जोरदार तालियों से पूरा हॉल गूँज उठा। कृष्णा को सबने सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाइयां दी। वही गुरुजी के एक विदेशी मित्र मैक आए हुए थे। वह कृष्णा से बहुत प्रभावित हुए और बोले, 'कृष्णा तुम्हारे गुरुजी तुम्हारी बहुत तारीफ करते हैं पर तुम तो उससे कहीं ज्यादा के काबिल हो। तुम हमारे साथ डेनमार्क चलो। वहाँ भारतीय नृत्य और कला के चाहने वाले बहुत हैं पर सिखाने वाला कोई नहीं। कृष्णा उनकी बातें सुनकर भावुक हो गया। मैक ने कृष्णा को गले लगाया और कहा कि, 'मैं ज्यादा तो नहीं, पर तुम्हें एक संगीत संस्था में शिक्षक का पद दिलवा सकता हूँ। बाकी तुम्हारी मेहनत से तुम जो चाहो पा सकते हो। कृष्णा अपने भावों को रोक नहीं पा रहा था कि वह क्या कहे? अब तक अखबार बेचकर, बच्चों को थोड़ा कत्थक सिखा कर ही जीविका चला रहा था। जैसे उसे अकल्पनीय कथ्य सुनने को मिले हैं। मैक ने फिर पूछा, 'तो बोलो कृष्णा सोच क्या रहे हो?' कृष्णा तो जैसे कब से सामान बांध में बैठा हो। उसके सपनों को उड़ान मिल गई थी। वह जाने के लिए तैयार हो गया।

     कुछ दिन बाद कृष्णा डेनमार्क चला गया। वहाँ उसने संगीत शिक्षक के रूप में काम शुरू किया। खाली समय में रात्रि गायन, नृत्य आयोजनों में भाग लेता रहा कई प्रतियोगिताओं में विजयी हुआ। और धीरे-धीरे एक दिन अंतर्राष्ट्रीय कलाकार के रूप में प्रख्यात हो गया। जब घर वालों ने उसकी खबर अखबार, न्यूज़ चैनल, टीवी पर देखी तो सब हैरान रह गए। जिसे सब नचैया, गवैया, नाकारा कहते थे। अब वे सब दाँतों तले अंगुली दबाने लगे।   

   कृष्णा पुन: जब अपने देश लौटा तो बहुत से उपहारों के साथ। सब परिवार वाले उसका स्वागत करने एयरपोर्ट पर आए आज कृष्णा अपने परिवार को देखकर अश्रुधारा को रोक नहीं पाया। उसे अपनी मन्जिल मिल चुकी थी। उसके सपने साकार हो गए थे। आज वह अपने देश की जमीन पर गर्व से कदम रख रहा था। जब घर पहुँचा तो जो लोग उसके विरोधी हो गए थे, वे सब आज भाग -भाग कर चाय पानी का इंतजाम करने लगी। भाभी ने देवर के लिए गरमा-गरम हलवा पुरी बनाया जो कभी खाना भी नहीं खिलाती थी। कृष्णा ने सब को विदेश से लाए उपहार दिए और सबसे अपने इस तरह छोड़कर जाने के लिए माफी माँगी। लेकिन  सबने उसे कब का माफ कर दिया था। सब बहुत खुश थे। आज तो कृष्णा को सब अपने साथ रखना चाह रहे थे। अब कोई अलगोजा करना नहीं चाहता था। 

   यह सब सोचते-सोचते कृष्णा ने अपने अतीत से निकलकर अखबार वाले बच्चे को अपने पास बुलाया और अखबार खरीद लिया। सोचा शायद इसकी भी सपनाें में उड़ान बाकी हो।

                                          -डॉ. रेखा सैनी

हिन्दी साहित्य सभा डॉ.रेखा सैनी द्वारा : 'आत्मसम्मान' मेरी स्वरचित कहानी

हिन्दी साहित्य सभा डॉ.रेखा सैनी द्वारा : 'आत्मसम्मान' मेरी स्वरचित कहानी :   आत्मसम्मान सुधा को राष्ट्रीय मंच पर पुरस्कार प्राप्त कर...